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हक की मौत- मोहर ए नबवी


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हम हर नमाज़ में अल्लाह से यह दुआ करते है कि ऐ अल्लाह हमें सीधा रास्ता दिखा, वह रास्ता जिसपर तु ने इनआम फरमाया है ना कि वह रास्ता जिसपर तु ने सज़ा मुकर्रर किया है (सुरह फातिहा आयत 6-7)। हर नमाज़ में यह दुआ पढ़ना खुद बता रहा है कि सीधे रास्ते पर चलने की क्या अहमियत है हमारे दीन में। सीधे रास्ते पर चलना ही हक़ पर चलना है। लेकिन यह भी बहुत अहम है कि हमारी मौत हक पर आये।

पिछले कुछ निबंध (articles) में मैंने तफसील से बताया था कि हक़ पर कैसे चला जाये और हक़ का सफर कैसे किया जाये। अब इस निबंध में मैं इस बात पर रोशनी डालना चाहुंगा कि हक़ की मौत क्या होती है और रसूल अललाह सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम ने हमें इसके बारे में क्या बताया है और सहाबा ए कराम ने इसपर अमल कैसे करके दिखाया है। 

حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ الْحَكَمِ بْنِ أَبِي زِيَادٍ، حَدَّثَنَا سَيَّارٌ، حَدَّثَنَا جَعْفَرٌ، عَنْ ثَابِتٍ، عَنْ أَنَسٍ، ‏:‏ أَنَّ النَّبِيَّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ دَخَلَ عَلَى شَابٍّ وَهُوَ فِي الْمَوْتِ فَقَالَ ‏:‏ ‏"‏ كَيْفَ تَجِدُكَ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ ‏:‏ أَرْجُو اللَّهَ يَا رَسُولَ اللَّهِ وَأَخَافُ ذُنُوبِي ‏.‏ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ ‏:‏ ‏"‏ لاَ يَجْتَمِعَانِ فِي قَلْبِ عَبْدٍ فِي مِثْلِ هَذَا الْمَوْطِنِ إِلاَّ أَعْطَاهُ اللَّهُ مَا يَرْجُو وَآمَنَهُ مِمَّا يَخَافُ ‏"‏ ‏.‏

अनस रज़िअल्लाहु तआला अन्हं रिवायत करते है कि रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम एक जवान लड़के के पास तशरीफ फरमा हुए जो मौत की हालत में था। रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम ने उस लड़के से फरमाया, “तुम्हें कैसा लग रहा है?” उन्होंने कहा, “ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम, मुझे अल्लाह पर उम्मीद है लेकिन मैं अपने गुनाहों से डरता हुं।” रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम ने फरमाया, “यह दो चिज़ (उम्मीद और ख़ौफ) इस सुरत ए हाल में एक शख्स के दिल में नहीं रहता लेकिन यह कि अल्लाह उसे अता कर देगा जिसकी वह उम्मीद करता है और उसे महफूज़ रखेगा उस चिज़ से जिससे वह ख़ौफ में है।” 

सुनन इब्ने माजा, हदीस 4261. शेख जुबैर अली जैई ने हसन कहा

ग़ौर करे! यह सहाबी ने यह नहीं कहा कि ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम मैं हक़ पर हुं, फिर्का ए नाजिया से हुं, मैं तो आपकी सोहबत में रहा, कुरआन में अल्लाह ने गवाही दी है कि अल्लाह मुझसे राज़ि, मैं अल्लाह से राज़ि, लेकिन नहीं!!! ख़ौफ और उम्मीद के बीच के मौत पर जो मरा वह हक़ पर मरा। सुब्हान अल्लाह बड़े-बड़े सहाबा ने ऐसा नहीं कहा कि मैं जन्नत में जाऊंगा बल्कि उम्मीद हमेशा की कि अल्लाह जन्नत दे और जहन्नम से नजात दे। और एक हम लोग है जो इतने गुनाहगार होकर भी जन्नती या फिर्का ए नाजिया का खुद का बनाया हुआ प्रमाण पत्र लेकर घुम रहे है। तो यह हक़ की मौत है कि हम अल्लाह से ख़ौफ करे और साथ-साथ अल्लाह से उम्मीद भी रखे।

अब आइये देखते है कि इस हदीस पर सहाबा ए कराम ने कैसे अमल करके दिखाया:

[उमर रज़िअल्लाहु तआला अन्हं की वफात के वक्त का बयान]

अम्र बिन मैमुन रज़िअल्लाहु तआला अन्हं रिवायत करते है, (उमर बिन खत्ताब रज़िअल्लाहु तआला अन्हं की वफात के वक्त, जब उमर रज़िअल्लाहु तआला अन्हं ज़ख्मी हालत में थे) एक नौजवान उमर रज़िअल्लाहु तआला अन्हं के पास आया और कहने लगा, ऐ अमीर अल मोमिनीन! अल्लाह तआला की तरफ से आपको खुशखबरी हो। आपने रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम की सोहबत उठाई। इब्तिदा में इस्लाम लाने का शर्फ हासिल किया जो कि आपको मालूम है। फिर आप खलिफा बनाये गये और आपने पूरे इंसाफ से हुकूमत किया, फिर शहादत पायी। यह सुनकर उमर रज़िअल्लाहु तआला अन्हं ने फरमाया, “(देखो ऐसा मत कहो) मेरे इन आमाल की वजह से कयामत के दिन मेरे नाम ए आमाल अगर बराबर भी हो गया तो मेरे लिए काफि होगा।”

(सहीह अल बुखारी, किताब फज़ाइल असहाब अन-नबी सल्लल्लाहु अलैही वसल्ल, हदीस नं.: 3700)

सुब्हान अल्लाह !!! अन्दाज़ा लगाईये अमीर अल मोमिनीन उमर इब्ने खत्ताब रज़िअल्लाहु तआला अन्हं जिनके बारे में रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम का फरमान है कि मेरे बाद अगर कोई नबी होता तो वह उमर होते (तिर्मिज़ी 3686), जिनके ताल्लुक से रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम ने फरमाया कि जिस गली से उमर रज़िअल्लाहु तआला अन्हं गुज़रते है उस गली से शैतान भाग जाता है (सहीह बुखारी 5735)। वह शख्स कह रहे है कि अगर मेरे आमाल बराबर भी हो जाये तो काफि है।

तो हमारा भी यही अख्लाक़ होना चाहिए कि हम बड़ी से बड़ी नेकी करने के बाद भी ज़मीन पर ही रहे, आसमान में उड़ने ना लग जाए। यही तरीका बेहतर है और इसी तरीके की तालीम हमें रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम ने दिया है और इसी तरीके पर सहाबा ए कराम ने अमल करके दिखाया है। हमें भी चाहिए कि हम अल्लाह से डरते रहे और उससे उम्मीद करते रहे लेकिन कभी तकब्बुर या तास्सुब में ना शामिल हो कि हमारे पास बहुत इल्म है या हमारे अमल बहुत ज़्यादा है। तो जैसा कि रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम ने खुद वज़ाहत किया, एक मुसलमान को अल्लाह से ख़ौफ और अल्लाह से उम्मीद में ज़िन्दगी बसर करनी चाहिए, यही सीधा रास्ता है।

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अल्लाह हमारी मौत ख़ौफ और उम्मीद के दर्मियान अता करे। आमीन।